मेरा बचपन तूफानों की चोट है
मेरा सावन सूखे पीपल की ओट है
देखा है जीवन को ऐसे, जैसे
ठंडी लाश पर कीटों का प्रकोप है।
ख़ुशी गायब फिर भी नहीं
क्यूंकि सपनो में कोई जहाँ नहीं
ज़िन्दगी बरसती है ऐसे, जैसे
गीली लकड़ी पर सुलगती आग है।
मैं वो हूँ जिसे हासिल न कुछ
मौत से वाकिफ़, डर तो है
ज़िन्दगी गले लगती है ऐसे, जैसे
पाषाण कोकिला का ग्रास है।
फिर आगे बढ़ना है, बढ़ के जीतना है
थम कर पट से युद्ध करना भी है
देखा है शांति को ऐसे, जैसे
पैसे पर खनकती कोई झंकार है।
मेरी मोत ही जीवन है
मेरे लिए ज्ञान सड़क और भूक है
देखूँगा मर कर शायद ऐसे, जैसे
स्वर्ग सत्य नहीं साहित्य है।
(This poem is dedicated to the children who lost their childhood to labour of any form...to those supressed dreams, lost giggles and lonely eyes.
Kudos to 'Right to Education' for all: Hope it enlivens their dreams )
3 comments:
very nice!!!
another aspect of childhood...righteously captured
captured so well.. unsaid unheard voices of a childhood
kya baat hai!!!
its so real...
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