Friday, December 10, 2010

इक फूँक

मेरी सूखी कलम को चंद बूँद स्याई उधर दी है
इक परायी फूँक ने आज मुझे उड़ान दी है


वोह जो ठहर गयी थी मासूम सी कहीं,
उस निश्चल सी सोच को ढलान दी है

इक अजनबी सी, परायी सी
फूँक ने मुझे नयी उड़ान दी है

जिस को सिमटा कर रखा था इतने वक़्त से
उस बेरंग दिल को नयी बहार दी है

किसी अनजान सी, छोटी सी नाजुक सी
परायी फूँक ने मेरे परों को नयी उड़ान दी है।

No comments: