Thursday, June 21, 2012

हो खूबसूरत चाहे कितना भी  
सुनहरी धूप का मरतबान 
बिखरती है गर्द , गर टूट जाए कभी 
सिर्फ रोशनी का कहाँ होता है वो आसमान।

रौशनी में पिरोए गर्द के मोती
हवा में उड़ आँखों को करते परेशान 
है जुदा क्यों, रंग विहीन क्यों आँचल 
ये बात करे हैरान 

होने से तेरे साथ स्याह भी 
होता है रंग मेहरबान 
न होने के तेरे संग मेरे 
सुना सा लगे इन्द्रधनुष और अनजान।

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