Tuesday, April 20, 2010

रेत

मुनासिब न था कि मिलें हमें रंग-सबरंग हँस के
कि जब थी हमारी बारी, गुलों पे खिज़ा छाई।

हमने पीछे छोड़ दिए किस्से पुराने अक्स के
फिर भी साथ चले, ये कौन सी परछाई।

घड़े थे कुछ सपने उमीदों की बेरंग माटी से
कि जब तड़क कोई हुई, गूंजी अनंत तन्हाई ।

रूह कि गरम रेत पे हैं निशा यादों के
हम मुड़ देखें न देखें, वो देतें हैं हमें जलाई।

Saturday, April 17, 2010

रंग स्याःह मुझे इस कदर
कि मुझ में तेरे होने का एहसास मिट जाये

चाह मुझे है धू से इस कदर
कि रौशनी में तेरा अक्स ही सिमट जाये।

Saturday, April 03, 2010

बचपन... यह भी

मेरा बचपन तूफानों की चोट है
मेरा सावन सूखे पीपल की ओट है
देखा है जीवन को ऐसे, जैसे
ठंडी लाश पर कीटों का प्रकोप है।

ख़ुशी गायब फिर भी नहीं
क्यूंकि सपनो में कोई जहाँ नहीं
ज़िन्दगी बरसती है ऐसे, जैसे
गीली लकड़ी पर सुलगती आग है।

मैं वो हूँ जिसे हासिल न कुछ
मौत से वाकिफ़, डर तो है
ज़िन्दगी गले लगती है ऐसे, जैसे
पाषाण कोकिला का ग्रास है।

फिर आगे बढ़ना है, बढ़ के जीतना है
थम कर पट से युद्ध करना भी है
देखा है शांति को ऐसे, जैसे
पैसे पर खनकती कोई झंकार है।

मेरी मोत ही जीवन है
मेरे लिए ज्ञान सड़क और भूक है
देखूँगा मर कर शायद ऐसे, जैसे
स्वर्ग सत्य नहीं साहित्य है।



(This poem is dedicated to the children who lost their childhood to labour of any form...to those supressed dreams, lost giggles and lonely eyes.

Kudos to 'Right to Education' for all: Hope it enlivens their dreams )
वोह कहतें हैं की मुक्मल न है किसी का जहाँ,
की हर खुशी में कुछ खलिश सी रहती है.
रश्क करने वाले मेरी खुशियों से, तुम्हें क्या इल्म,
उनमें किसी के न होने की चुभन रहती है.