Sunday, October 12, 2014

प्यार के इंतज़ार में


इक उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
कभी अनजाने बैठे बैठे बन लेता है हसीं सी कहानी
कभी अकस्मात् सचाई देख के उधेड़ देता है उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुनी और उधेड़ी वो कहानी
जहाँ तुम थे नायक और मैं तुम्हारी रानी

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
बुनता है तुम्हारे दिल को अपने दिल से
फिर तुम्हारी बेरुखी को देख उधेड़ देता है उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुनी  और उधेड़ी वो बात
जब तुम थे इसके साथ हर दिन हर रात

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
सीता है तेरी खामोशियों के खलिश से ज़ख़्म
और कभी खुद ही नोच देता है यादों को उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुना और उधेड़ा अपना इश्क़
दिखे … अपने ज़ख्मों पर तुम्हारी फूँक और अपने अश्क़

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
है प्यार का इंतज़ार इसे
तेरी एहसासों की दरकार इसे
डेओडी में खड़ा है … है यही कश्मकश
की है क्या इसे सपने बुनने का भी हक़?

Saturday, August 02, 2014

इस बार की बारिश

इस बार की बारिश बड़ी देर से आई
इंतज़ार ज़्यादा था … उम्र कुछ कम
पानी बरसा तो गज़ब , पर देरी से बरसा
जिस्म भीगे … और रूह सूखी रह गयी

इस बार की बारिश बड़ी देर से आई
उम्मीद ए चिंगारी थी … कि जलें हम
पानी बरसा, सुलगती लौ पे बरसा
एहसास जागे…और आँखें वीरान रह गयी

इस बार की बारिश बड़ी देर से आई
अकस्मात् तुम साथ चले… इतने हमारे करम?
पानी बरसा, ज़रा थम के बरसा
साँस टूटी… और मैं ज़िंदा रह गयी



Friday, May 09, 2014

अधूरी गुफ्तगू

काफी दिनों बाद
आज समय मिला तो
कहीं दबी छुपी डायरी को झाड़ा
और देखा एक गुफ्तगू
बेमतलब की उड़ निकली

कहीं जानी पहचानी काफी लिखी थी
कहीं कुछ अनजान से हर्फ़ बने थे

अजब  सी थी वो गुफ्तगू
जैसे कन्याकुमारी के तथ पे
शांत खड़ी बंगाल कि खाड़ी के
कान में अरब सागर कुछ कह रह था

जैसे रंग बिरंगी सियहि
थोड़ी बिखर गयी थी...
इक ओर शर्मीला गुलाबी
चुप चाप बैठा था
इक ओर शीतल हरा
उस नारंगी चंचलता को ढक रहा था

मुझे दिखा कैसे
वो गरजता लाल
सुन्हेरी हँसी सुन, मँद हो
प्रेम के कसीदे पढ़ रह था

ज़िद्दी से रंग भी
बेमेल रह न सके
दूर बैठे बैठे ही
अल्फ़ाज़ बुनने लगे थे

कुछ नीले से ख्वाब
गुंथने लगे हि थे...
की अगली कड़ी में सब रंग
फीके पड़ने लगे

यूँ लगा कि खेल के मैदान में
सब बच्चे मौन हो गये, जब
कोई एक रूठ के कह गया
"मुझे नहीं खेलना अब"

किसकी थी ये बातें ?
कौन रूठ गया था ?
एकाँकी कि सोच थी बस...
या कोई युगल टूट गया था ?

आज समय कुछ कम सा है
ये पहेली सुलझने में देर करेगी
हाथ भी खाली नहीं
रंगों की पैलेट भी गिरेगी

अगले सफ़े पर शायद
इक गीत लिखा है
सुर ताल जोड़ के
उसे गुनगुना लेती हूँ

क्या पता कोई सुर
गलती से कहीं गिर जाएं
और पिछले पन्ने की गुफ्तगू ...
... मुक़मल हो जाए