Sunday, October 12, 2014

प्यार के इंतज़ार में


इक उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
कभी अनजाने बैठे बैठे बन लेता है हसीं सी कहानी
कभी अकस्मात् सचाई देख के उधेड़ देता है उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुनी और उधेड़ी वो कहानी
जहाँ तुम थे नायक और मैं तुम्हारी रानी

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
बुनता है तुम्हारे दिल को अपने दिल से
फिर तुम्हारी बेरुखी को देख उधेड़ देता है उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुनी  और उधेड़ी वो बात
जब तुम थे इसके साथ हर दिन हर रात

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
सीता है तेरी खामोशियों के खलिश से ज़ख़्म
और कभी खुद ही नोच देता है यादों को उसी पल
कितनी बार नजाने इसने बुना और उधेड़ा अपना इश्क़
दिखे … अपने ज़ख्मों पर तुम्हारी फूँक और अपने अश्क़

ऐसी ही उधेड़बुन में रहता है दिल आज कल
है प्यार का इंतज़ार इसे
तेरी एहसासों की दरकार इसे
डेओडी में खड़ा है … है यही कश्मकश
की है क्या इसे सपने बुनने का भी हक़?