Monday, September 24, 2012

तुम कुछ देर बाद आए

मैं जान गई थी यह रिश्ता

एहसास का तेरे मेरे बहुत पहले

उन प्यार के उफनते बुलबुलों को

रखा था बहुत देर से दबाए

पर तुम कुछ देर बाद आए ...



है क्षणिक हर बुलबुला

है मियाद हर इंतज़ार की

हर उम्मीद का बुलबुला

जब टूट गया

तुम उस देर बाद आये ...



या मैं नहीं थी तुम्हारी मंजिल

या थे तुम रसता भूले

कुछ वजह ज़रूर रही होगी

की तुम जो कुछ देर बाद आये ...


अब आ के कहते हो

है बंजर मेरे दिल का हर कोना

कोई यहाँ कोंपल कैसे लगाये ?

तुम जानते नहीं, या भूल गए

की तुम कुछ देर बाद थे आये ...



गर आसान होता इंतज़ार

वक़्त की क्या औकाद होती

पर है वक़्त अब बीत गया

वीरानों में कौन दिया जलाये

हो तुम बस कुछ देर बाद आये ...



रंगों का कारवां जब आया

तुम न थे यहाँ रंगरेज़ मेरे

अब बीते कारवां को

कोई कैसे आवाज़ लगाये

तुम उनके जाने के बाद आये ...



जब मिले ही नहीं कभी हम

बिछुड़ने का गम भी क्यूँ सताए ?

चाहते है बस यही

की तुम्हें यह अफ़सोस ने हो

की तुम कुछ देर बाद आये ...



है एक अदद अदब का

निशां सा बाकी

हम चल तो दिए, पर मुड़ के देखा

उस मज़ार को

जहाँ तुम कुछ देर बाद आये ...