Wednesday, November 21, 2012

राख़ का व्यापार


हसीन संगेमरमर की इक उपज था 
सुना है बहुत पहले कभी, कहीं इक बुत था मैं 
थी जियारत मुझसे मिलने आना 
तिजारत का अनमोल सामन था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

कभी प्रेमियों के मिलने की दास्ताँ 
कुछ खिलखिलाहट,कुछ कसमों की यादगार था मैं 
कितने कवियों की परवाज़, कितने शायरों का ख्वाब 
कहते हाँ खूब शायरी का इरशाद था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

फिजाओं में चमकते कँवल सा 
खिज़ाओं मैं कहाँ दागदार था मैं?
तेरे क़दमों के छूने से पहले 
इमारत ही था, कहाँ इंसान था मैं?
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

तेरी छुहन से अचानक जिंदा 
कोई चीज़, दिल शायद उसका ईमान था मैं 
अनजाने से एहसासों में घिर रहा 
कभी सेहरा कभी समंदर था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

जो आहिस्ता आहिस्ता बढ़ चला 
वो चिंगारी और आग था मैं 
इक रोशन काफिले का मजमा था वहां 
कुछ देर तक आबाद था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

फिर तेरे क़दमों की आहट हुई खत्म 
फिर तेरी त्वजोह का अकाल था मैं 
कभी खिल गया था तेरे आने से 
अब बेनूर हुई राख़ था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

सन्नाटों का शोर सा बस
इक ग़ुम हो चुका सा ख्वाब हूँ मैं 
कई बार हुई आहटें 
बेजान सा बेसुध सा हालातों से अनजान था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं 

संगेमरमर का सफ़र राख़ तक 
कहते हैं फिर आफ़ताब था मैं 
की जिसके बदले में मिली आब-ए-हयात तुझे 
वही व्यापार का सामान था मैं 
सुना है बहुत पहले कभी इक ताज था मैं