खुशरुह पड़ी राहों पे
कोई परवाज़ तो बहाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये
मोड़ लायेंगे रूह-ए-रुस्तम
के सब ख्वाब
कोई सब्र कर इल्म का
दिया तो जलाये
बेंइनतेहां सोच है नादां की
कोई इस दिल पे लगाम तो लगाये
आफताब की ओट है आगाज़ पे
कोई उठ चाँद का दाग तो हटाये
सिमटी पड़ी है हर शाख या रब!
कोई इन फूलों को रस्ता तो दिखाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये
Monday, June 14, 2010
Monday, June 07, 2010
कल जो बिछ्ड़े थे मेरे साए
वो मिलेंगे कहीं अगले मोड़ पर
मुझसे कहती हैं अनंत सदाएं
की वो मुर्दा जी लेंगे उस सहर
शवेत-श्याम के वेश में
गिरते-उठते दिनों के पहर
जाने कौन कहीं से खींच लाए
सुख दुःख के ध्वनियों की नव लहर
मैं खड़ी, जैसे मजबूर बिखरी सी हवाएं
ढूँढती मेरे अपनों का घर
मूक शिला सा, राहों को देता सदाएं
सूनी चाहतों का मेरा खोखला धड
वो मिलेंगे कहीं अगले मोड़ पर
मुझसे कहती हैं अनंत सदाएं
की वो मुर्दा जी लेंगे उस सहर
शवेत-श्याम के वेश में
गिरते-उठते दिनों के पहर
जाने कौन कहीं से खींच लाए
सुख दुःख के ध्वनियों की नव लहर
मैं खड़ी, जैसे मजबूर बिखरी सी हवाएं
ढूँढती मेरे अपनों का घर
मूक शिला सा, राहों को देता सदाएं
सूनी चाहतों का मेरा खोखला धड
Saturday, June 05, 2010
है चाहत अब भी
पतझड़ के आहट से
गुलशन ज़ार-ज़ार हो गिरा।
पर भवरों के भ्रमर को
कलियों से है चाहत अब भी॥
तूफान के कातिल पाँव ने
नष्ट कर दिया घरोंदा।
पर नम आँखों के सपनों को
जीवन से है चाहत अब भी॥
लहरों के प्रकोप ने
सिमटा दी भूख की ललक।
पर पेट बांधे अपनों को
चावल से है चाहत अब भी॥
ग़लतफ़हमियों के दायरे ने
बाँट दिया दोस्तों का अपनत्व।
पर दूर हुए अतीत को
भविष्य से है चाहत अब भी॥
गुलशन ज़ार-ज़ार हो गिरा।
पर भवरों के भ्रमर को
कलियों से है चाहत अब भी॥
तूफान के कातिल पाँव ने
नष्ट कर दिया घरोंदा।
पर नम आँखों के सपनों को
जीवन से है चाहत अब भी॥
लहरों के प्रकोप ने
सिमटा दी भूख की ललक।
पर पेट बांधे अपनों को
चावल से है चाहत अब भी॥
ग़लतफ़हमियों के दायरे ने
बाँट दिया दोस्तों का अपनत्व।
पर दूर हुए अतीत को
भविष्य से है चाहत अब भी॥
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