Sunday, July 18, 2010

गुदगुदा जाती है वीरान वादियों में
एहसास तुम्हारे आवाज़ की
और इक चीख निकलते चुप हो जाती है
ढक जाती है चादर मुझे मेरे लाज की

Monday, July 12, 2010

मैं बैठी रौशनी के बागीचे में
बुनती रहती हूँ इक श्यामिल ज़ंजीर


वहीँ..

मेरा अक्स फँसा अंधेरों के दायेरों में
ढूँढ रहा अपना अनंत उज्जवल नीर

Sunday, July 11, 2010

उसके हिस्से कि तन्हाई

गोल चश्में के पीछे छिपी, उम्र से सयानी
बचपन को बाँचती कहानी, पूरे मुहाले की वो नानी।


कहती थी,

कैसे खेल खेलते ये सब बुढ़ापे से
यम छीन लाया मेरी खुशियों कि इमारत को
ओर तोड़ डाली मेरे बच्चों ने किवाड़-दीवारें ऐसे
कि मेरे हिस्से बस परछाई आई।

जब खुशियाँ भर भर आई उन्ही किवाड़ों से
बंटी खूब मिठाइयाँ सारे मोहल्ले को
होंठ को मेरे मिली मिठास कुछ ऐसे
कि हिस्से मेरे, बस आँखें ललचाई ।

बचपन ने थामा हाथ जतन से
बाकी भूली मैं होनी-अनहोनी को
मेरे सपनों के देश पराए हुए ऐसे
कि मेरे हिस्से आई एक आखिरी अंगड़ाई।

शोर शराबा, गीत जाने आए कहाँ से
उन अपने-बेगाने लगते नादों को
मैंने सुन अनदेखा किया कुछ ऐसे
कि सुखद लगी, मेरे हिस्से कि तन्हाई।