Friday, May 09, 2014

अधूरी गुफ्तगू

काफी दिनों बाद
आज समय मिला तो
कहीं दबी छुपी डायरी को झाड़ा
और देखा एक गुफ्तगू
बेमतलब की उड़ निकली

कहीं जानी पहचानी काफी लिखी थी
कहीं कुछ अनजान से हर्फ़ बने थे

अजब  सी थी वो गुफ्तगू
जैसे कन्याकुमारी के तथ पे
शांत खड़ी बंगाल कि खाड़ी के
कान में अरब सागर कुछ कह रह था

जैसे रंग बिरंगी सियहि
थोड़ी बिखर गयी थी...
इक ओर शर्मीला गुलाबी
चुप चाप बैठा था
इक ओर शीतल हरा
उस नारंगी चंचलता को ढक रहा था

मुझे दिखा कैसे
वो गरजता लाल
सुन्हेरी हँसी सुन, मँद हो
प्रेम के कसीदे पढ़ रह था

ज़िद्दी से रंग भी
बेमेल रह न सके
दूर बैठे बैठे ही
अल्फ़ाज़ बुनने लगे थे

कुछ नीले से ख्वाब
गुंथने लगे हि थे...
की अगली कड़ी में सब रंग
फीके पड़ने लगे

यूँ लगा कि खेल के मैदान में
सब बच्चे मौन हो गये, जब
कोई एक रूठ के कह गया
"मुझे नहीं खेलना अब"

किसकी थी ये बातें ?
कौन रूठ गया था ?
एकाँकी कि सोच थी बस...
या कोई युगल टूट गया था ?

आज समय कुछ कम सा है
ये पहेली सुलझने में देर करेगी
हाथ भी खाली नहीं
रंगों की पैलेट भी गिरेगी

अगले सफ़े पर शायद
इक गीत लिखा है
सुर ताल जोड़ के
उसे गुनगुना लेती हूँ

क्या पता कोई सुर
गलती से कहीं गिर जाएं
और पिछले पन्ने की गुफ्तगू ...
... मुक़मल हो जाए