Wednesday, September 04, 2013



कहतें हैं खत्म हो जाता है
जलने से वजूद
जो उडती है राख स्याह
फिर वो क्या है ?

हूँ न जिंदा अब , है न शरीर
सिर्फ है बची रुह
हैरत कि जो दर्द
फिर वो क्या है ?

जला है जिस्म जहाँ, दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो  राख, जुस्तजू क्या है??

                                  ~ मिर्ज़ा ग़ालिब