Friday, December 10, 2010

इक फूँक

मेरी सूखी कलम को चंद बूँद स्याई उधर दी है
इक परायी फूँक ने आज मुझे उड़ान दी है


वोह जो ठहर गयी थी मासूम सी कहीं,
उस निश्चल सी सोच को ढलान दी है

इक अजनबी सी, परायी सी
फूँक ने मुझे नयी उड़ान दी है

जिस को सिमटा कर रखा था इतने वक़्त से
उस बेरंग दिल को नयी बहार दी है

किसी अनजान सी, छोटी सी नाजुक सी
परायी फूँक ने मेरे परों को नयी उड़ान दी है।

Saturday, October 02, 2010

Whisper Mongers

In the long lost spasms of time…
I saw a bend in the river
Which divulged the secrets of my being
Through its platters of silver.


I was afraid to wake up some placid dreams
By the splinter of my thoughts; so
I wished to move silently through
The wilderness at dawn.


The softly gliding water I thought
Would keep to its pace
And I’ll slide easily
Across the granules of plains


Alas! Waters-the whisper mongers
Divulged the secret
And made path for my distorted image
Into the silence of eternity.

Sunday, July 18, 2010

गुदगुदा जाती है वीरान वादियों में
एहसास तुम्हारे आवाज़ की
और इक चीख निकलते चुप हो जाती है
ढक जाती है चादर मुझे मेरे लाज की

Monday, July 12, 2010

मैं बैठी रौशनी के बागीचे में
बुनती रहती हूँ इक श्यामिल ज़ंजीर


वहीँ..

मेरा अक्स फँसा अंधेरों के दायेरों में
ढूँढ रहा अपना अनंत उज्जवल नीर

Sunday, July 11, 2010

उसके हिस्से कि तन्हाई

गोल चश्में के पीछे छिपी, उम्र से सयानी
बचपन को बाँचती कहानी, पूरे मुहाले की वो नानी।


कहती थी,

कैसे खेल खेलते ये सब बुढ़ापे से
यम छीन लाया मेरी खुशियों कि इमारत को
ओर तोड़ डाली मेरे बच्चों ने किवाड़-दीवारें ऐसे
कि मेरे हिस्से बस परछाई आई।

जब खुशियाँ भर भर आई उन्ही किवाड़ों से
बंटी खूब मिठाइयाँ सारे मोहल्ले को
होंठ को मेरे मिली मिठास कुछ ऐसे
कि हिस्से मेरे, बस आँखें ललचाई ।

बचपन ने थामा हाथ जतन से
बाकी भूली मैं होनी-अनहोनी को
मेरे सपनों के देश पराए हुए ऐसे
कि मेरे हिस्से आई एक आखिरी अंगड़ाई।

शोर शराबा, गीत जाने आए कहाँ से
उन अपने-बेगाने लगते नादों को
मैंने सुन अनदेखा किया कुछ ऐसे
कि सुखद लगी, मेरे हिस्से कि तन्हाई।

Monday, June 14, 2010

खुशरुह पड़ी राहों पे
कोई परवाज़ तो बहाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये


मोड़ लायेंगे रूह-ए-रुस्तम
के सब ख्वाब
कोई सब्र कर इल्म का
दिया तो जलाये


बेंइनतेहां सोच है नादां की
कोई इस दिल पे लगाम तो लगाये
आफताब की ओट है आगाज़ पे
कोई उठ चाँद का दाग तो हटाये


सिमटी पड़ी है हर शाख या रब!
कोई इन फूलों को रस्ता तो दिखाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये

Monday, June 07, 2010

कल जो बिछ्ड़े थे मेरे साए
वो मिलेंगे कहीं अगले मोड़ पर
मुझसे कहती हैं अनंत सदाएं
की वो मुर्दा जी लेंगे उस सहर

शवेत-श्याम के वेश में
गिरते-उठते दिनों के पहर
जाने कौन कहीं से खींच लाए
सुख दुःख के ध्वनियों की नव लहर

मैं खड़ी, जैसे मजबूर बिखरी सी हवाएं
ढूँढती मेरे अपनों का घर
मूक शिला सा, राहों को देता सदाएं
सूनी चाहतों का मेरा खोखला धड

Saturday, June 05, 2010

है चाहत अब भी

पतझड़ के आहट से
गुलशन ज़ार-ज़ार हो गिरा।
पर भवरों के भ्रमर को
कलियों से है चाहत अब भी

तूफान के कातिल पाँव ने
नष्ट कर दिया घरोंदा।
पर नम आँखों के सपनों को
जीवन से है चाहत अब भी

लहरों के प्रकोप ने
सिमटा दी भूख की ललक।
पर पेट बांधे अपनों को
चावल से है चाहत अब भी

ग़लतफ़हमियों के दायरे ने
बाँट दिया दोस्तों का अपनत्व।
पर दूर हुए अतीत को
भविष्य से है चाहत अब भी

Tuesday, April 20, 2010

रेत

मुनासिब न था कि मिलें हमें रंग-सबरंग हँस के
कि जब थी हमारी बारी, गुलों पे खिज़ा छाई।

हमने पीछे छोड़ दिए किस्से पुराने अक्स के
फिर भी साथ चले, ये कौन सी परछाई।

घड़े थे कुछ सपने उमीदों की बेरंग माटी से
कि जब तड़क कोई हुई, गूंजी अनंत तन्हाई ।

रूह कि गरम रेत पे हैं निशा यादों के
हम मुड़ देखें न देखें, वो देतें हैं हमें जलाई।

Saturday, April 17, 2010

रंग स्याःह मुझे इस कदर
कि मुझ में तेरे होने का एहसास मिट जाये

चाह मुझे है धू से इस कदर
कि रौशनी में तेरा अक्स ही सिमट जाये।

Saturday, April 03, 2010

बचपन... यह भी

मेरा बचपन तूफानों की चोट है
मेरा सावन सूखे पीपल की ओट है
देखा है जीवन को ऐसे, जैसे
ठंडी लाश पर कीटों का प्रकोप है।

ख़ुशी गायब फिर भी नहीं
क्यूंकि सपनो में कोई जहाँ नहीं
ज़िन्दगी बरसती है ऐसे, जैसे
गीली लकड़ी पर सुलगती आग है।

मैं वो हूँ जिसे हासिल न कुछ
मौत से वाकिफ़, डर तो है
ज़िन्दगी गले लगती है ऐसे, जैसे
पाषाण कोकिला का ग्रास है।

फिर आगे बढ़ना है, बढ़ के जीतना है
थम कर पट से युद्ध करना भी है
देखा है शांति को ऐसे, जैसे
पैसे पर खनकती कोई झंकार है।

मेरी मोत ही जीवन है
मेरे लिए ज्ञान सड़क और भूक है
देखूँगा मर कर शायद ऐसे, जैसे
स्वर्ग सत्य नहीं साहित्य है।



(This poem is dedicated to the children who lost their childhood to labour of any form...to those supressed dreams, lost giggles and lonely eyes.

Kudos to 'Right to Education' for all: Hope it enlivens their dreams )
वोह कहतें हैं की मुक्मल न है किसी का जहाँ,
की हर खुशी में कुछ खलिश सी रहती है.
रश्क करने वाले मेरी खुशियों से, तुम्हें क्या इल्म,
उनमें किसी के न होने की चुभन रहती है.

Sunday, March 21, 2010

Oh! how lost I was until I found you
How useless till u settled your eyes on me
So unsure till I held your hand
So silly till I thought that…..

No matter what path I choose
It would be the right one
Why u ask?
Because, you’ll walk along with me.

For righteous
Are not the decisions
But the thoughts
Governing them…..

I walk now with you
Thinking about you, living you each moment
On the path I chose
I was never wrong...
I was always right!!

Sunday, March 14, 2010

सारांश

मेरे सफ़र की मंजिल
भू-खंड न आकाश.

मेरे सफ़र को हासिल
अँधेरा न प्रकाश.

मेरे सफ़र पर अर्जित
जीवन न कोई लाश.

मेरे सफ़र का पथ
समतल न धार.

मेरे सफ़र का परिणाम
विजय न हार.

मेरे सफ़र का अर्थ
जीवन का सारांश..

Thursday, February 04, 2010

वेहेम

जिंदा रहने दो यह वेहेम कुछ और पल दो पल
की यही बकाया वेहेम मेरी ज़िन्दगी है।