Tuesday, April 20, 2010

रेत

मुनासिब न था कि मिलें हमें रंग-सबरंग हँस के
कि जब थी हमारी बारी, गुलों पे खिज़ा छाई।

हमने पीछे छोड़ दिए किस्से पुराने अक्स के
फिर भी साथ चले, ये कौन सी परछाई।

घड़े थे कुछ सपने उमीदों की बेरंग माटी से
कि जब तड़क कोई हुई, गूंजी अनंत तन्हाई ।

रूह कि गरम रेत पे हैं निशा यादों के
हम मुड़ देखें न देखें, वो देतें हैं हमें जलाई।

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