पतझड़ के आहट से
गुलशन ज़ार-ज़ार हो गिरा।
पर भवरों के भ्रमर को
कलियों से है चाहत अब भी॥
तूफान के कातिल पाँव ने
नष्ट कर दिया घरोंदा।
पर नम आँखों के सपनों को
जीवन से है चाहत अब भी॥
लहरों के प्रकोप ने
सिमटा दी भूख की ललक।
पर पेट बांधे अपनों को
चावल से है चाहत अब भी॥
ग़लतफ़हमियों के दायरे ने
बाँट दिया दोस्तों का अपनत्व।
पर दूर हुए अतीत को
भविष्य से है चाहत अब भी॥
1 comment:
very nice.
Umeed pe hi to duniya kayam hai...
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