गोल चश्में के पीछे छिपी, उम्र से सयानी
बचपन को बाँचती कहानी, पूरे मुहाले की वो नानी।
कहती थी,
कैसे खेल खेलते ये सब बुढ़ापे से
यम छीन लाया मेरी खुशियों कि इमारत को
ओर तोड़ डाली मेरे बच्चों ने किवाड़-दीवारें ऐसे
कि मेरे हिस्से बस परछाई आई।
जब खुशियाँ भर भर आई उन्ही किवाड़ों से
बंटी खूब मिठाइयाँ सारे मोहल्ले को
होंठ को मेरे मिली मिठास कुछ ऐसे
कि हिस्से मेरे, बस आँखें ललचाई ।
बचपन ने थामा हाथ जतन से
बाकी भूली मैं होनी-अनहोनी को
मेरे सपनों के देश पराए हुए ऐसे
कि मेरे हिस्से आई एक आखिरी अंगड़ाई।
शोर शराबा, गीत जाने आए कहाँ से
उन अपने-बेगाने लगते नादों को
मैंने सुन अनदेखा किया कुछ ऐसे
कि सुखद लगी, मेरे हिस्से कि तन्हाई।
1 comment:
Really Really Good Poem.
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