Monday, July 12, 2010

मैं बैठी रौशनी के बागीचे में
बुनती रहती हूँ इक श्यामिल ज़ंजीर


वहीँ..

मेरा अक्स फँसा अंधेरों के दायेरों में
ढूँढ रहा अपना अनंत उज्जवल नीर

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