जला कर खत्म कर दिया
जिस माजी के पन्ने को
वो मुझ में
आज भी जिंदा है
टटोल कर खाली कर दिया
जिस ज़हन और दिल को
बीतें पलों की आहट वहां
आज भी जिंदा है
मुझ नादां ने सोचा
आ रहे कल को सुन्हेरी बनूंगी
बीते तेरी खताएं
अपनी हथेलियों से छुपाऊँगी
चुग-चुग कर उजाड़ कर दिया
जिस गुलशन को, वहाँ चुभते
तेरी मेरी गलतियों के काँटे
आज भी जिंदा है
सूख चुके खारे आँसू
दिल के हर कोने में
रख बन घोटने को
आज भी जिंदा है
कैसे कह दूँ भूल चुकी हूँ
उस माजी की आवाज़
मेरी तन्हाइयों में वो
आज भी जिंदा है
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