कल जो बिछ्ड़े थे मेरे साए
वो मिलेंगे कहीं अगले मोड़ पर
मुझसे कहती हैं अनंत सदाएं
की वो मुर्दा जी लेंगे उस सहर
शवेत-श्याम के वेश में
गिरते-उठते दिनों के पहर
जाने कौन कहीं से खींच लाए
सुख दुःख के ध्वनियों की नव लहर
मैं खड़ी, जैसे मजबूर बिखरी सी हवाएं
ढूँढती मेरे अपनों का घर
मूक शिला सा, राहों को देता सदाएं
सूनी चाहतों का मेरा खोखला धड
1 comment:
tumhari hindi to gazab hai.. really.. and choice of topic and write is excellent
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