Monday, June 07, 2010

कल जो बिछ्ड़े थे मेरे साए
वो मिलेंगे कहीं अगले मोड़ पर
मुझसे कहती हैं अनंत सदाएं
की वो मुर्दा जी लेंगे उस सहर

शवेत-श्याम के वेश में
गिरते-उठते दिनों के पहर
जाने कौन कहीं से खींच लाए
सुख दुःख के ध्वनियों की नव लहर

मैं खड़ी, जैसे मजबूर बिखरी सी हवाएं
ढूँढती मेरे अपनों का घर
मूक शिला सा, राहों को देता सदाएं
सूनी चाहतों का मेरा खोखला धड

1 comment:

Sudeep Singh Rawat said...

tumhari hindi to gazab hai.. really.. and choice of topic and write is excellent