खुशरुह पड़ी राहों पे
कोई परवाज़ तो बहाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये
मोड़ लायेंगे रूह-ए-रुस्तम
के सब ख्वाब
कोई सब्र कर इल्म का
दिया तो जलाये
बेंइनतेहां सोच है नादां की
कोई इस दिल पे लगाम तो लगाये
आफताब की ओट है आगाज़ पे
कोई उठ चाँद का दाग तो हटाये
सिमटी पड़ी है हर शाख या रब!
कोई इन फूलों को रस्ता तो दिखाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये
1 comment:
its beautifull said preeti.. heartfelt
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