Monday, June 14, 2010

खुशरुह पड़ी राहों पे
कोई परवाज़ तो बहाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये


मोड़ लायेंगे रूह-ए-रुस्तम
के सब ख्वाब
कोई सब्र कर इल्म का
दिया तो जलाये


बेंइनतेहां सोच है नादां की
कोई इस दिल पे लगाम तो लगाये
आफताब की ओट है आगाज़ पे
कोई उठ चाँद का दाग तो हटाये


सिमटी पड़ी है हर शाख या रब!
कोई इन फूलों को रस्ता तो दिखाए
हम खड़े हैं रहगुज़र पे
कोई आवाज़ तो लगाये

1 comment:

Sudeep Singh Rawat said...

its beautifull said preeti.. heartfelt